गिनती के लोगों की बैठक पर जताई नाराजगी, मांगा पूर्व के चंदा का हिसाब
सहरसा:-स्थानीय भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में कार्यरत 350 से अधिक अतिथि सहायक प्राध्यापकों के बीच संघ के पुनर्गठन को लेकर विवाद हो रहा है। संघ के वर्तमान महासचिव डॉ. दीपक ने कई गंभीर आरोप लगाते संघ के नव गठित संरचना पर सवाल उठाया है। साथ ही पूर्व में संघ के सदस्यों के चंदे की बंदर बांट का भी हिसाब मांगा है। इतना ही नहीं संघ के पुनर्गठन में नाम पर मात्र 20-22 सदस्यों को ही आमंत्रित करने को लेकर भी सवाल पूछा है। जिससे संगठन के सदस्यों में असंतोष देखा जा रहा है। महासचिव डॉ. दीपक कुमार ने बताया कि मात्र 20- 22 लोगों की बैठक में संघ के पुनर्गठन होना मजाक बन गया है। जहां संघ के पदाधिकारियों का चयन का निर्णय लिया गया। जबकि अन्य सभी 325 से अधिक अतिथि शिक्षकों को संघ के पुनर्गठन की कोई सूचना तक नहीं दी गई। जिससे कारण लोकतांत्रिक तरीके से संघ के अधिकारियों का चुनाव नहीं किया गया। मनमाने ढंग से पदाधिकारियों को चयनित कर लिया गया। जो संघ के निर्माण पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहा है। डॉ. दीपक ने कहा कि बीते कुछ वर्षों से न्यायिक मामलों, आंदोलनों और अन्य गतिविधियों के नाम पर अतिथि शिक्षकों से लाखों रुपये की राशि चंदे के रूप में एकत्रित की गई थी।
लेकिन उस आमदनी और उस पैसे के खर्च का कोई विवरण अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया। संगठन के चंदे से जमा पैसे का हिसाब मांगना प्रत्येक शिक्षक का अधिकार है। लेकिन पैसे का कोई हिसाब नहीं दिया जा रहा है। जो बड़े घोटाले को दिखा रहा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि संघ के वर्तमान महासचिव को संघ के पुनर्गठन की आयोजित बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया। जिससे संघ की पुर्नगठन की प्रक्रिया ही असंवैधानिक हो जाती है। वही विश्वविद्यालय की सेवा से 2 वर्ष पूर्व सेवानिवृत हो चुके पूर्व अध्यक्ष को पुनः संयोजक बनाए जाने पर भी सवाल उठाया गया है। उन्होंने आगे कहा कि अखबार में प्रकाशित खबर में संगठन के गठन का प्रस्ताव डॉ रफत परवेज द्वारा लाए जाने पर भी विवाद है। डॉ. दीपक के अनुसार डॉ. रफत परवेज ने ऐसा कोई प्रस्ताव देने से इनकार किया था। लेकिन उनके प्रस्ताव पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। महासचिव डॉ. दीपक ने कहा कि विश्वविद्यालय में कार्यरत सभी 350 अतिथि शिक्षकों की आमसभा बुलाकर ही संघ का पुनर्गठन किया जाना चाहिए। जो लोकतांत्रिक तरीका होता। मात्र गिनती के लोगों की बैठक में संघ का गठन कहीं से स्वीकार्य नहीं है। इसके बदले सभी शिक्षकों की सहभागिता से लोकतांत्रिक चुनाव कराया जाए। बीते वर्षों में एकत्रित चंदे का पूरा आय-व्यय विवरण सार्वजनिक किया जाए। चंदे की राशि का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। सभी महाविद्यालयों को संघ में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए। पदाधिकारियों के चयन की प्रक्रिया एवं संघ की नियमावली सार्वजनिक की जाए। संगठन को किसी व्यक्ति या गुट के बजाय सभी अतिथि शिक्षकों का लोकतांत्रिक मंच बनाया जाए। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं है। हमारा सवाल स्पष्ट है। संगठन सभी अतिथि शिक्षकों का है। तो निर्णय भी सभी की मौजूदगी में होना चाहिए। शिक्षकों से लिए गए पैसे का हिसाब भी सभी के सामने होना चाहिए। उन्होंने सभी अतिथि सहायक प्राध्यापकों से एकजुट होकर संघ का विधिवत पुनर्गठन करने की अपील किया था।



